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'दीपु को पेड़ से बांधा, मिट्टी तेल डाला और आग लगा दी...', बांग्लादेश में पीट-पीटकर मारे गए हिंदू लड़के के पिता ने सुनाई आपबीती

बांग्लादेश में एक हिंदू युवक दीपु चंद्र दास की इस्लामिक भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या और शव जलाए जाने की घटना ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. भारत-विरोधी कट्टरपंथी नेता उस्मान शरीफ हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा में कट्टर इस्लामिक ताकतें खुलकर सड़कों पर उतर आई हैं. इस बर्बर घटना को लेकर भारत समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ रही है और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर दबाव बन रहा है.

Bangladesh Hindu lynching: बांग्लादेश में एक बार फिर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. देश में भारत-विरोधी कट्टरपंथी नेता उस्मान शरीफ हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा के बीच एक हिंदू युवक की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. यह दिल दहला देने वाली घटना मयमनसिंह जिले की है, जहां एक इस्लामिक भीड़ ने युवक पर कथित तौर पर इस्लाम का अपमान करने का आरोप लगाकर उसे मौत के घाट उतार दिया.

मृतक की पहचान 30 वर्षीय दीपु चंद्र दास के रूप में हुई है, जो एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करता था. घटना के बाद उग्र भीड़ की बर्बरता यहीं नहीं रुकी. युवक के शव को एक पेड़ से बांधकर केरोसिन डालकर जला दिया गया, जबकि आसपास मौजूद कई लोग इस अमानवीय कृत्य का जश्न मनाते नजर आए.

फेसबुक से मिली बेटे की हत्या की खबर, पिता की टूटी आवाज

दीपु चंद्र दास के पिता रवी लाल दास ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि उन्हें अपने बेटे की हत्या की जानकारी सबसे पहले फेसबुक के जरिए मिली. उन्होंने कहा कि पहले सोशल मीडिया पर बातें फैलनी शुरू हुईं, फिर लोगों ने बताया कि उनके बेटे को बेरहमी से पीटा गया है.

उन्होंने दर्द भरे शब्दों में बताया कि कुछ ही देर बाद उनके चाचा ने आकर बताया कि दीपु को एक पेड़ से बांध दिया गया है. इसके बाद भीड़ ने उसके ऊपर मिट्टी का तेल डाला और आग लगा दी. जला हुआ शव वहीं बाहर छोड़ दिया गया. पिता का कहना है कि सरकार की तरफ से अब तक उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है.

किसने भड़काई भीड़? अब भी साफ नहीं

मृतक के पिता ने यह भी कहा कि अभी यह साफ नहीं है कि हत्या में शामिल लोग जमात-ए-इस्लामी या उसके छात्र संगठन छत्र शिबिर से जुड़े थे या नहीं. उन्होंने कहा कि लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई का पता जांच के बाद ही चलेगा.

बांग्लादेशी प्रशासन ने इस मामले में अब तक सात लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन घटना ने पूरे देश में डर और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है.

उस्मान हादी की मौत के बाद बढ़ी कट्टरपंथी हिंसा

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-विरोधी कट्टरपंथी नेता उस्मान शरीफ हादी की मौत के बाद से बांग्लादेश में उग्र इस्लामिक ताकतें और ज्यादा सक्रिय हो गई हैं. आम चुनावों से पहले इस तरह की घटनाएं अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही हैं.

हादी की हत्या के विरोध के नाम पर ढाका समेत कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए, जिनमें सरकारी इमारतों और संस्थानों को भी निशाना बनाया गया.

पूर्व मंत्री का आरोप: सड़कों पर उतरे जिहादी संगठन

शेख हसीना सरकार में सूचना मंत्री रह चुके मोहम्मद अली अराफात ने दावा किया है कि हादी की मौत के विरोध में शाहबाग में हुआ प्रदर्शन बाद में जिहादी और कट्टरपंथी ताकतों का मंच बन गया.

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस प्रदर्शन में अल-कायदा से जुड़े संगठन अंसारुल्लाह बांग्ला टीम के सरगना जसीमुद्दीन रहमानी समेत कई कट्टरपंथी नेता मौजूद थे, जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए. अराफात ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर आईएसआईएस के झंडे तक लहराए गए.

ढाका में प्रतीकात्मक इमारत पर हमला, सरकार पर सवाल

अराफात ने यह भी आरोप लगाया कि ढाका के धनमंडी 32 स्थित ऐतिहासिक आवास को फिर से नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई और सरकार ने इसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया. उन्होंने अंतरिम सरकार पर भीड़ की हिंसा को नजरअंदाज करने और राजनीतिक लाभ के लिए जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाया.

भारत में भी उठा आक्रोश, प्रियंका गांधी ने जताई चिंता

इस घटना को लेकर भारत में भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे बेहद चिंताजनक बताया और कहा कि धर्म के आधार पर की जाने वाली हिंसा किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है.

उन्होंने भारत सरकार से अपील की कि वह बांग्लादेश में हिंदू, ईसाई और बौद्ध अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा मजबूती से वहां की सरकार के सामने उठाए.

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर फिर बड़ा सवाल

दीपु चंद्र दास की नृशंस हत्या ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं. चुनाव से पहले बढ़ती कट्टरता, हिंसक भीड़ और सरकार की कमजोर प्रतिक्रिया ने हालात को और गंभीर बना दिया है. यह मामला सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए चेतावनी बनकर सामने आया है.

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