ऑफिस गए और लौटे को बने करोड़पति! 540 कर्मचारियों को ₹2,154 करोड़ का बोनस, मिलिए असल जिंदगी के सांता CEO से
अमेरिका के लुइसियाना में स्थित Fibrebond कंपनी के CEO ग्राहम वॉकर ने कंपनी बेचने के बाद अपने 540 कर्मचारियों को ₹2,154 करोड़ का बोनस दिया. कर्मचारियों को औसतन करीब ₹4 करोड़ तक की रकम मिली, जिससे कई लोग रातों-रात करोड़पति बन गए. यह कहानी मेहनत, भरोसे और कर्मचारियों की वफादारी को सम्मान देने की मिसाल बन गई है.
सोचिए, आप रोज़ की तरह काम पर जाएं और शाम को घर लौटते वक्त आपकी जेब में करोड़ों रुपये हों. अमेरिका के लुइसियाना राज्य में स्थित एक फैक्ट्री के 500 से ज्यादा कर्मचारियों के साथ ठीक ऐसा ही हुआ. यहां कंपनी के CEO ने अपने कर्मचारियों को कुल 240 मिलियन डॉलर (करीब ₹2,154 करोड़) का बोनस बांट दिया, जिससे कई कर्मचारी रातों-रात करोड़पति बन गए.
यह असाधारण कहानी है Fibrebond नाम की कंपनी की, जिसे बेचने के बाद उसके CEO ग्राहम वॉकर ने अपने कर्मचारियों को उनकी मेहनत और वफादारी का इनाम दिया.
कंपनी बेचते ही बन गए कर्मचारियों के लिए 'सांता क्लॉज़'
द वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, Fibrebond के CEO ग्राहम वॉकर ने कंपनी को 1.7 बिलियन डॉलर में बेचा. लेकिन इस डील में उन्होंने एक खास शर्त रखी, 'कंपनी की बिक्री से मिलने वाली रकम का 15% हिस्सा कर्मचारियों को दिया जाएगा.'
नतीजा यह हुआ कि 540 फुल-टाइम कर्मचारियों को औसतन 4.43 लाख डॉलर (लगभग ₹3.98 करोड़) का बोनस मिला, जो अगले पांच सालों में दिया जाएगा। लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों को इससे कहीं ज्यादा रकम मिली.
Fibrebond की शुरुआत और संघर्ष की कहानी
Fibrebond की नींव 1982 में ग्राहम वॉकर के पिता क्लॉड वॉकर ने रखी थी. शुरुआत में यह कंपनी टेलीफोन, बिजली उपकरण और रेलवे ट्रैक के लिए ढांचे बनाती थी.
1990 के दशक में कंपनी ने मोबाइल टावरों के लिए कंक्रीट ढांचे बनाना शुरू किया और सेलुलर बूम के साथ तेजी से आगे बढ़ी.
लेकिन 1998 में एक बड़ा झटका लगा, जब फैक्ट्री में आग लग गई और पूरा प्लांट जलकर खाक हो गया. काम महीनों तक बंद रहा, फिर भी वॉकर परिवार ने कर्मचारियों को तनख्वाह देना बंद नहीं किया. यही वजह थी कि कर्मचारियों का भरोसा कंपनी पर और मजबूत हो गया.
डॉट-कॉम संकट और छंटनी का दौर
साल 2000 के बाद डॉट-कॉम बबल फूटने से Fibrebond का कारोबार फिर डगमगाया. ग्राहकों की संख्या घटकर सिर्फ तीन रह गई और कर्मचारियों की संख्या 900 से घटाकर 320 करनी पड़ी.
2000 के दशक के मध्य में ग्राहम वॉकर और उनके भाई ने कंपनी की कमान संभाली. उन्होंने कर्ज चुकाया, संपत्तियां बेचीं और नए बाजार तलाशने की कोशिश की, लेकिन रास्ता आसान नहीं था.
मुश्किल वक्त में भी कर्मचारियों का साथ
कई सालों तक सैलरी फ्रीज़ रही, लेकिन कंपनी ने जरूरतमंद कर्मचारियों के लिए एक फंड बनाया, जिससे वे अपने बिल चुका सकें. यही कारण था कि कठिन दौर में भी कर्मचारी कंपनी छोड़कर नहीं गए.
2013 में Fibrebond Power नाम से नया डिवीजन शुरू किया गया, जो हाई-टेक इंडस्ट्रियल ढांचे बनाने लगा.
2015 में ग्राहम वॉकर CEO बने और उन्होंने पहले निकाले गए कुछ कर्मचारियों को भी वापस रखा.
कंपनी ने व्यक्तिगत बोनस की जगह ग्रुप बोनस कल्चर शुरू किया, जहां सेफ्टी और टारगेट पूरे होने पर सभी को इनाम मिलता था.
जोखिम भरा दांव और बड़ी कामयाबी
Fibrebond ने डेटा सेंटर और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ढांचे बनाने में 150 मिलियन डॉलर का निवेश किया. यह फैसला जोखिम भरा था, लेकिन कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान क्लाउड कंप्यूटिंग की मांग बढ़ते ही कंपनी की किस्मत बदल गई.
इसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और LNG टर्मिनल्स की बढ़ती मांग ने बिक्री को और मजबूत कर दिया. पिछले पांच सालों में कंपनी की बिक्री करीब 400% बढ़ गई.
यही वजह रही कि पावर मैनेजमेंट कंपनी Eaton ने इस साल Fibrebond को खरीद लिया.
जब बोनस मिला, तो किसी को यकीन नहीं हुआ
जून में जब कर्मचारियों को नीले-सफेद लिफाफों में बोनस के चेक मिले, तो कई लोग रो पड़े, तो कुछ को लगा कि यह मजाक है.
लेसिया की, जो 1995 से फैक्ट्री में काम कर रही हैं और कभी 5.35 डॉलर प्रति घंटे पर नौकरी शुरू की थी, बोनस देखकर फूट-फूटकर रो पड़ीं. उन्होंने अपने पैसे से कर्ज चुकाया और एक कपड़ों की दुकान खोल ली.
हेक्टर मोरेनो, कंपनी के सीनियर एग्जीक्यूटिव, अपने बोनस से 25 रिश्तेदारों को लेकर मैक्सिको की ट्रिप पर गए.
पूरे शहर की अर्थव्यवस्था में आई रौनक
Minden शहर के मेयर निक कॉक्स के मुताबिक, बोनस के चलते स्थानीय बाजारों में खर्च बढ़ गया है और पूरे शहर में आर्थिक हलचल तेज हो गई है.
वियतनाम से आई प्रवासी कर्मचारी हॉन्ग ब्लैकवेल (67) ने बोनस मिलने के बाद रिटायरमेंट ले लिया. उन्होंने अपने पति के लिए नई कार खरीदी और अब सुकून भरी जिंदगी जी रही हैं.
CEO का विदाई संदेश
ग्राहम वॉकर 31 दिसंबर को कंपनी छोड़ देंगे. उनका कहना है, 'मैं चाहता हूं कि जब मैं 80 साल का हो जाऊं, तब भी मुझे कोई कर्मचारी ईमेल करे और बताए कि इस पैसे ने उसकी जिंदगी कैसे बदल दी.'
यह कहानी सिर्फ बिजनेस की नहीं, बल्कि भरोसे, वफादारी और इंसानियत की मिसाल बन चुकी है.
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