विधायक से लेकर सांसद तक! ताश के पत्तों की तरह बिखर रही ममता सेना, TMC राजनीतिक संकट पर ताजा UPDATE
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद Mamata Banerjee की तृणमूल कांग्रेस (TMC) गंभीर राजनीतिक संकट से गुजर रही है. पार्टी के भीतर असंतोष अब खुली बगावत में बदलता नजर आ रहा है. कम से कम 20 सांसदों ने NDA में शामिल होने की इच्छा जताई है, जबकि कई विधायक और नेता नेतृत्व के खिलाफ खुलकर सामने आ चुके हैं.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद Mamata Banerjee और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. चुनाव परिणामों को झटका माना जा रहा था, लेकिन इसके बाद पार्टी के भीतर जिस तरह से असंतोष और बगावत सामने आई है, उसने TMC के राजनीतिक भविष्य पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
ताजा घटनाक्रम में पार्टी के कम से कम 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल होने की इच्छा जताई है. इसके कुछ घंटे पहले ही राज्यसभा सांसद Sukhendu Shekhar Ray ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था.
राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ एक राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के 15 वर्षों से बने राजनीतिक वर्चस्व पर सबसे बड़ा हमला मान रहे हैं.
चुनाव हार के बाद शुरू हुई अंदरूनी कलह
पार्टी के भीतर असंतोष की शुरुआत विधानसभा चुनाव में TMC की हार के तुरंत बाद दिखाई देने लगी थी.
चुनाव में बीजेपी ने 294 में से 207 सीटें जीतकर सत्ता हासिल कर ली। वहीं ममता बनर्जी को भी अपने गढ़ भवानीपुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा. उन्हें उनके पूर्व सहयोगी और बाद में बीजेपी नेता बने Suvendu Adhikari ने हराया.
इसके बाद पार्टी के कई नेताओं ने खुलकर नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.
अभिषेक बनर्जी पर उठे सवाल
TMC के कई नेताओं ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee की कार्यशैली पर नाराजगी जाहिर की.
नेताओं का आरोप था कि पार्टी में भ्रष्टाचार बढ़ गया है और शीर्ष नेतृत्व आम कार्यकर्ताओं तथा जनता की नाराजगी से पूरी तरह कट चुका है.
बताया गया कि कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को जनता की समस्याओं और प्रशासनिक कमियों के प्रति असंवेदनशील बताया.
इस्तीफों का सिलसिला बना बड़ी चुनौती
असंतोष धीरे-धीरे खुले विद्रोह में बदलता गया. पूर्व सांसद संतनु सेन ने पार्टी प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया, जबकि वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तिदार ने पार्टी के सभी पद छोड़ दिए. इसके अलावा 100 से अधिक नगर पार्षदों ने भी अपने पदों से इस्तीफा देकर नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी का संकेत दिया.
इन घटनाओं ने साफ कर दिया कि पार्टी के भीतर असंतोष अब सीमित नहीं रह गया है.
ममता की बैठक से दूर रहे 60 विधायक
30 मई को पार्टी संकट और गहरा गया, जब ममता बनर्जी की अध्यक्षता में उनके कालीघाट स्थित आवास पर बुलाई गई बैठक में 80 में से 60 विधायक शामिल नहीं हुए.
हालांकि पार्टी ने इसकी अलग वजह बताई, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे नेतृत्व के प्रति बढ़ते अविश्वास का संकेत माना.
यह घटना इस बात का संकेत थी कि पार्टी के भीतर ममता बनर्जी की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है.
विधानसभा में भी बदल गया शक्ति संतुलन
चुनावी हार के करीब एक महीने बाद TMC को एक और बड़ा झटका लगा.
पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर विधायक Ritabrata Banerjee को विपक्ष का नेता बनाने का समर्थन दिया.
विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया और ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी.
इस फैसले के बाद विधानसभा में TMC के विधायी दल पर ममता खेमे का नियंत्रण काफी कमजोर पड़ गया.
अभिषेक बनर्जी पर लगातार हमलावर हैं बागी नेता
नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद ऋतब्रत बनर्जी लगातार अभिषेक बनर्जी पर हमला बोल रहे हैं.
उन्होंने अभिषेक पर भ्रष्टाचार, वंशवाद को बढ़ावा देने और चुनावी हार के लिए जिम्मेदार होने जैसे आरोप लगाए हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम महाराष्ट्र में Shiv Sena और Nationalist Congress Party में हुए विभाजन जैसी स्थिति की ओर इशारा करता है.
अब संसद तक पहुंची बगावत
TMC का संकट अब विधानसभा से निकलकर संसद तक पहुंच चुका है. काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में बागी सांसदों का एक समूह सामने आया है, जिसने दावा किया है कि 20 सांसद NDA में शामिल होने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र दे चुके हैं.
दिलचस्प बात यह रही कि जब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल थे, उसी समय बागी सांसद केंद्रीय मंत्री Bhupender Yadav के आवास पर बैठक कर रहे थे. इस घटनाक्रम ने TMC नेतृत्व की चिंता और बढ़ा दी है.
क्या ममता बचा पाएंगी अपनी राजनीतिक पकड़?
बीते डेढ़ दशक तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का दबदबा लगभग निर्विवाद रहा है. लेकिन चुनावी हार के बाद जिस तेजी से पार्टी के भीतर विरोध बढ़ा है, उसने उनकी नेतृत्व क्षमता और संगठन पर पकड़ को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
हालांकि पार्टी के कई बागी विधायक अब भी ममता बनर्जी को अपना सर्वोच्च नेता मानते हैं. यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ममता की व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी भी TMC की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है.
TMC के भविष्य पर टिकी सबकी नजर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी पार्टी में बढ़ती बगावत को रोक पाएंगी या TMC भी देश की उन क्षेत्रीय पार्टियों की सूची में शामिल हो जाएगी, जो अंदरूनी कलह के कारण कमजोर हो गईं.
आने वाले दिनों में सांसदों और विधायकों का रुख तय करेगा कि यह असंतोष केवल नाराजगी तक सीमित रहता है या फिर TMC में बड़े राजनीतिक विभाजन का कारण बनता है.
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