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कैसे तय हुई भारत-पाकिस्तान की सीमाएं? जानें बंटवारे का जजमेंट और कैसे जजों ने खींची थी लकीर

साल 1947 में भारत-पाकिस्तान का बंटवारा सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं था, बल्कि एक ऐतिहासिक प्रक्रिया थी जिसमें जजों ने अहम भूमिका निभाई. ब्रिटिश सरकार ने सीमाएं तय करने के लिए बाउंड्री कमीशन बनाया और सर सिरिल रैडक्लिफ को पंजाब और बंगाल की नई सीमा खींचने की जिम्मेदारी दी.

India and Pakistan Partition: साल 1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं था, बल्कि यह एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ था जिसे तय करने में जजों की अहम भूमिका रही. एक खींची गई रेखा ने न सिर्फ दो देशों की सीमाएं तय कीं, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी, पहचान और भविष्य को भी बदल दिया.

बंटवारे का फैसला क्यों हुआ?

ब्रिटिश राज के अंत में भारत में हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक मतभेद इतने गहरे हो चुके थे कि एक संयुक्त देश का सपना कमजोर पड़ गया. मुस्लिम लीग ने अलग देश की मांग तेज कर दी और अंततः ब्रिटेन ने भारत को आजाद करते समय दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया—भारत और पाकिस्तान.

सीमाएं तय करने का जिम्मा जजों को क्यों मिला?

उस समय यह तय करना बेहद मुश्किल था कि किन इलाकों को भारत में और किन्हें पाकिस्तान में शामिल किया जाए. यह काम सिर्फ भूगोल का नहीं था, बल्कि इसमें जनसंख्या, धर्म, प्रशासन और राजनीतिक हालात भी शामिल थे. ब्रिटिश सरकार ने इस जटिल काम के लिए एक बाउंड्री कमीशन बनाया, जिसमें जजों की नियुक्ति की गई.

रैडक्लिफ लाइन: वह लकीर जिसने सब कुछ बदल दिया

सीमाएं खींचने का जिम्मा ब्रिटिश वकील और जज सर सिरिल रैडक्लिफ को दिया गया. वे भारत पहले कभी नहीं आए थे और उनके पास सीमाएं तय करने के लिए सिर्फ 5 हफ्तों का समय था. उन्होंने पंजाब और बंगाल को दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया—एक हिस्सा भारत में, दूसरा पाकिस्तान में.

फैसले में जजों की भूमिका

बाउंड्री कमीशन में भारत और पाकिस्तान, दोनों तरफ से जज मौजूद थे। पंजाब और बंगाल के हाई कोर्ट के जजों ने स्थानीय जनसंख्या, धार्मिक आंकड़े और प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर अपनी सिफारिशें दीं. लेकिन आखिरी फैसला रैडक्लिफ ने लिया, जिसमें कई जगह राजनीतिक दबाव भी काम आया.

कई इलाकों जैसे गुरदासपुर और मुरलीवाला का भारत या पाकिस्तान में शामिल होना बाद के दशकों में विवाद का कारण बना.

बंटवारे का असर और विवाद

इस जल्दबाजी में खींची गई लकीर ने लगभग 1.4 करोड़ लोगों को अपने घर-बार छोड़ने पर मजबूर कर दिया. सांप्रदायिक दंगे, हिंसा और पलायन ने लाखों जानें ले लीं. सीमाओं को लेकर विवाद आज भी जारी है, खासकर जम्मू-कश्मीर में.

इतिहास से सबक

भारत-पाकिस्तान बंटवारे में जजों का काम सिर्फ कानूनी फैसला नहीं था, बल्कि एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी थी. लेकिन जल्दबाजी, राजनीतिक दबाव और अधूरी जानकारी के कारण यह फैसला इंसानी त्रासदी में बदल गया. यह इतिहास हमें सिखाता है कि सीमाएं सिर्फ नक्शे पर नहीं खींची जातीं, बल्कि वे लोगों के दिलों में भी असर छोड़ती हैं.

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