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किस स्थिति में रुपया गिरता है और डॉलर की पकड़ क्यों होती है मजबूत? जानिए आम आदमी की जेब पर कितना पड़ेगा असर

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिरकर 96.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेश में कमी और वैश्विक तनाव इसकी बड़ी वजह माने जा रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे महंगाई बढ़ सकती है और RBI के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है.

Rupee vs Dollar: भारतीय रुपया (INR) लगातार कमजोर होता जा रहा है. बुधवार के कारोबार में रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 96.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट केवल एक दिन की हलचल नहीं है, बल्कि पिछले कुछ महीनों से रुपये पर लगातार बढ़ते दबाव का नतीजा मानी जा रही है. आर्थिक जानकारों का कहना है कि महंगे कच्चे तेल, डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी निवेश में सुस्ती ने भारतीय मुद्रा को कमजोर कर दिया है.

दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ पांच महीने पहले यानी दिसंबर 2025 में रुपया पहली बार 90 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचा था. उससे पहले दिसंबर 2024 में पहली बार यह 85 प्रति डॉलर के पार गया था. अब महज 17 महीनों में रुपया 85 से गिरकर लगभग 97 तक पहुंच गया है, जिसने बाजार और सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है.

क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?

विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेज बढ़ोतरी. फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में तेल महंगा होने पर भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है.

इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान युद्ध जैसे हालात ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है. निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर की तरफ जा रहे हैं, जिससे भी भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा है.

विदेशी निवेशकों की सतर्कता भी बनी वजह

विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय बाजार में पहले की तुलना में कम पैसा लगा रहे हैं. जब विदेशी निवेश घटता है तो देश में डॉलर का प्रवाह कम हो जाता है। इससे भी रुपये पर दबाव आता है.

Enrich Money के CEO पोनमुडी आर के अनुसार, रुपये की कमजोरी से आयातित महंगाई बढ़ सकती है. यानी विदेशों से आने वाले सामान महंगे हो जाएंगे. इसका असर कंपनियों की लागत पर पड़ेगा और अंततः आम लोगों को महंगी वस्तुओं और सेवाओं का सामना करना पड़ सकता है.

भारत के लिए बढ़ सकता है आर्थिक खतरा

ब्रोकरेज फर्म Systematix ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत को लगातार तीसरे साल भुगतान संतुलन (Balance of Payments) घाटे का सामना करना पड़ सकता है. इसका मतलब है कि देश से बाहर जाने वाला पैसा, आने वाले पैसे से ज्यादा हो सकता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि महंगाई और धीमी आर्थिक वृद्धि का दबाव एक साथ बढ़ रहा है, जिसे 'स्टैगफ्लेशन' जैसी स्थिति माना जा रहा है. ऐसे हालात में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए रुपये को 100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर जाने से रोकना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा.

एक साल में 11% कमजोर हुआ रुपया

Kotak Mahindra AMC के फिक्स्ड इनकम प्रमुख अभिषेक बिसेन के मुताबिक, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से रुपया करीब 5 प्रतिशत कमजोर हुआ है, जबकि पिछले एक साल में इसमें लगभग 11 प्रतिशत की गिरावट आई है.

उन्होंने कहा कि चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit) वित्त वर्ष 2027 तक GDP के 2 प्रतिशत से ज्यादा हो सकता है. यह भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति के लिए चिंता का संकेत है.

सरकार ने उठाए शुरुआती कदम

रुपये की कमजोरी को देखते हुए सरकार ने कुछ कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. सोना और चांदी पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाई गई है। इसके अलावा पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी दो बार बढ़ोतरी की जा चुकी है.

विदेशी ब्रोकरेज कंपनी Citi के अनुसार, सरकार अब विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए नए कदम उठा सकती है. साथ ही कंपनियों के विदेशों में निवेश को लेकर नियम सख्त किए जा सकते हैं ताकि डॉलर का बाहर जाना कम हो.

आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में रुपया 96.25 से 97 के दायरे में कारोबार कर सकता है. LKP Securities के रिसर्च एनालिस्ट जतीन त्रिवेदी के अनुसार, बाजार में फिलहाल निवेशक डॉलर खरीदना और रुपये को बेचना ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं.

हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि रुपये की वैल्यू अभी वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) के आधार पर काफी कमजोर दिखाई दे रही है, इसलिए लंबी अवधि में इसमें कुछ सुधार की संभावना हो सकती है. लेकिन फिलहाल तेल की कीमतें और वैश्विक तनाव ही रुपये की दिशा तय करेंगे.

RBI के सामने बढ़ी चुनौती

Systematix की रिपोर्ट के अनुसार, RBI फिलहाल महंगाई में आई तेजी को अस्थायी मानकर नजरअंदाज कर सकता है. लेकिन अगर महंगाई लंबे समय तक बनी रही और रुपया लगातार कमजोर होता गया, तो RBI को ब्याज दरों में फिर बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.

अगर ऐसा होता है तो पिछले साल अपनाई गई आसान मौद्रिक नीति, जिसमें ब्याज दरों में कटौती और बाजार में ज्यादा नकदी डालने जैसे कदम शामिल थे, उसे वापस लेना पड़ सकता है. इससे कर्ज महंगे हो सकते हैं और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है.

आम आदमी पर क्या होगा असर?

रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है. पेट्रोल-डीजल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, विदेश से आने वाले सामान और हवाई यात्रा महंगी हो सकती है. इसके अलावा कंपनियों की लागत बढ़ने से रोजमर्रा के उत्पादों की कीमतों में भी इजाफा देखने को मिल सकता है.

आर्थिक जानकारों का कहना है कि अगर वैश्विक तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तभी रुपये को कुछ राहत मिल सकती है. फिलहाल बाजार की नजर RBI और सरकार के अगले कदमों पर टिकी हुई है.

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