भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील से टेंशन में आया बांग्लादेश, जानिए किन वजहों से मची खलबली
चुनाव से 72 घंटे पहले बांग्लादेश और अमेरिका ट्रेड डील साइन करने जा रहे हैं, जिसकी शर्तें गोपनीय रखी गई हैं. टैरिफ 20% से घटकर 15% होने की उम्मीद है, लेकिन RMG उद्योग और रोजगार पर असर को लेकर चिंता बढ़ी है. विशेषज्ञों और उद्योग जगत ने पारदर्शिता की कमी और समय-चयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
US India trade deal Before Bangladesh Election: बांग्लादेश और अमेरिका 9 फरवरी को एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं और यह कदम 12 फरवरी के राष्ट्रीय चुनाव से ठीक 72 घंटे पहले उठाया जा रहा है. समझौते की शर्तें सार्वजनिक न होने के कारण देश के भीतर इस डील को लेकर तीखी आलोचना हो रही है. न तो मसौदा जनता के साथ साझा किया गया है, न संसद के साथ, और न ही प्रमुख उद्योग हितधारकों के साथ.
भारत-अमेरिका समझौते के बाद ढाका की जल्दबाज़ी
ढाका पर इस डील को जल्द अंतिम रूप देने का दबाव तब बढ़ा, जब भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ घटकर 18% हो गया. बांग्लादेश को डर है कि अगर उसे बराबरी या बेहतर शर्तें नहीं मिलतीं, तो अमेरिकी बाजार में उसका हिस्सा भारत के हाथों खिसक सकता है. इसकी वजह साफ है कि अमेरिका को बांग्लादेश के निर्यात में रेडीमेड गारमेंट (RMG) का हिस्सा बेहद बड़ा है.
टैरिफ की कहानी: 37% से 15% तक?
अप्रैल 2025 में वॉशिंगटन ने ढाका पर 37% का ऊंचा टैरिफ लगाया था. जुलाई में यह 35% हुआ, अगस्त में 20% तक आया. अब आने वाली ट्रेड डील से इसे और घटाकर 15% करने की उम्मीद जताई जा रही है.
गोपनीयता समझौता और ‘शर्तों’ की चर्चा
मध्य-2025 में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अमेरिका के साथ एक औपचारिक नॉन-डिस्क्लोज़र एग्रीमेंट (NDA) साइन किया, जिसके तहत टैरिफ और व्यापार वार्ताओं को गोपनीय रखने का वचन दिया गया. स्थानीय रिपोर्टों में दावा है कि डील में कुछ ‘शर्तें’ भी शामिल हैं, जैसे चीन से आयात घटाना, रक्षा खरीद अमेरिका से बढ़ाना, अमेरिकी उत्पादों को बांग्लादेशी बाजार में आसान प्रवेश देना, अमेरिकी मानकों/सर्टिफिकेशन को बिना सवाल स्वीकार करना, और अमेरिकी वाहनों व पार्ट्स के आयात पर निरीक्षण न करना.
पारदर्शिता पर विशेषज्ञों की आपत्ति
सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग (CPD) के विशिष्ट फेलो देवप्रिया भट्टाचार्य का कहना है कि डील पारदर्शी नहीं है, इसलिए इसके फायदे-नुकसान पर गंभीर चर्चा का अवसर नहीं मिला. उनका सवाल है कि चुनाव के बाद यह समझौता होता तो राजनीतिक दलों के बीच बहस संभव थी; अभी यह भी चिंता है कि आने वाली निर्वाचित सरकार के हाथ पहले से बांध दिए जा रहे हैं.
चुनाव से पहले हस्ताक्षर, लागू करने की जिम्मेदारी अगली सरकार पर
क्योंकि यह डील एक निर्वाचित नहीं, बल्कि अंतरिम प्रशासन साइन कर रहा है, इसलिए इसे लागू करने की जिम्मेदारी उस दल पर आएगी जो चुनाव जीतकर सरकार बनाएगा. यही बिंदु आलोचना का बड़ा कारण बना हुआ है.
अमेरिकी बाजार पर भारी निर्भरता
बांग्लादेश हर साल अमेरिका को लगभग 7 से 8.4 अरब डॉलर के कपड़े और टेक्सटाइल निर्यात करता है, जो अमेरिका को उसके कुल निर्यात का लगभग 96% है. इसके उलट, बांग्लादेश अमेरिका से करीब 2 अरब डॉलर का सामान खरीदता है. ऐसे में व्यापार नियमों में कोई भी बदलाव ढाका के लिए बेहद अहम हो जाता है.
भारत से प्रतिस्पर्धा और रोजगार पर खतरा
भारत और बांग्लादेश अमेरिकी बाजार में मिलते-जुलते उत्पाद खासतौर पर कपड़े बेचते हैं. अगर भारत को 18% टैरिफ का फायदा मिलता है और बांग्लादेश की ‘गोपनीय’ डील इससे बेहतर साबित नहीं होती, तो अमेरिकी खरीदार ऑर्डर भारत की ओर मोड़ सकते हैं. इससे बांग्लादेश में लाखों नौकरियों पर असर पड़ने का खतरा है.
परिधान उद्योग: अर्थव्यवस्था की रीढ़
बांग्लादेश का गारमेंट सेक्टर 40 से 50 लाख लोगों को रोजगार देता है, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं. देश के कुल निर्यात से आने वाली कमाई का 80% से अधिक इसी सेक्टर से आता है और यह पूरी अर्थव्यवस्था का करीब 20% हिस्सा बनाता है.
उद्योग जगत की चिंता
BGMEA (Bangladesh Garment Manufacturers and Exporters Association) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष इनामुल हक खान ने चिंता जताई कि उद्योग जगत को पता ही नहीं कि डील की शर्तें किन सेक्टरों को नुकसान पहुंचा सकती हैं. उनके मुताबिक, अगर अमेरिका से खरीद बढ़ाने के लक्ष्य पूरे किए जाते हैं, तो पारस्परिक टैरिफ 15% तक आ सकता है, लेकिन चुनाव से तीन दिन पहले हस्ताक्षर चौंकाने वाले हैं.
अर्थशास्त्री की कड़ी टिप्पणी
अर्थशास्त्री अनु मुहम्मद ने पारदर्शिता की कमी को ‘असंगत’ बताया और आरोप लगाया कि सरकार में सलाहकारों के रूप में विदेशी लॉबिस्ट सक्रिय हैं, जो इस तरह के समझौते आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इतनी जल्दबाज़ी क्यों है और देश को जोखिम भरी स्थिति में क्यों धकेला जा रहा है.
राजनीतिक संकेत भी चर्चा में
इसी बीच यह भी चर्चा में है कि अमेरिकी कूटनीतिज्ञों ने जमात-ए-इस्लामी जैसे दल के साथ काम करने के संकेत दिए हैं, जिसे बांग्लादेश के इतिहास में कई बार प्रतिबंधित किया गया है.









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