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Jayant Narlikar कौन थे, जिन्होंने महज 26 साल की उम्र में भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार किया था प्राप्त?

Jayant Vishnu Narlikar Died: प्रोफेसर नार्लीकर के करीबी सहयोगियों के अनुसार, वैज्ञानिक की कूल्हे की हड्डी टूटने की सर्जरी दो सप्ताह पहले शहर के एक अस्पताल में हुई थी. वे घर पर ही स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे. जयंत नार्लीकर का मंगलवार को नींद में निधन हो गया. इस जुलाई में वे 87 वर्ष के हो जाते.

Jayant Vishnu Narlikar Died: खगोल वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर का मंगलवार को पुणे में 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया. नार्लीकर इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) के संस्थापक निदेशक और एक उत्साही विज्ञान संचारक थे. नार्लीकर के परिवार में उनकी तीन बेटियां - गीता, गिरिजा और लीलावती हैं, जो सभी वैज्ञानिक अनुसंधान में हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि जयंत नार्लीकर का निधन वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक बड़ी क्षति है. उन्होंने एक्स पर लिखा, 'वे एक महान व्यक्ति थे, विशेष रूप से खगोल भौतिकी के क्षेत्र में... उन्होंने एक संस्थान निर्माता के रूप में अपनी पहचान बनाई और युवा मस्तिष्कों के लिए शिक्षण और नवाचार के केंद्र तैयार किए. उनके लेखन ने विज्ञान को आम नागरिकों तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.'

जयंत नार्लीकर कौन थे?

जयंत विष्णु नार्लीकर का जन्म 19 जुलाई, 1938 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था. उन्होंने अपने शुरुआती साल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (वपह) के कैंपस में बिताए, जहां उनके पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर प्रोफेसर और गणित विभाग के प्रमुख थे. उनकी मां सुमति नार्लीकर संस्कृत की विद्वान थीं. उन्होंने 1957 में बीएचयू से बीएससी की डिग्री हासिल की.

इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए, जहां वे रैंगलर बन गए और गणितीय ट्रिपोस में टायसन पदक जीता. उन्होंने कैम्ब्रिज से कई डिग्रियां हासिल कीं: 1960 में BA, 1963 में PhD, 1964 में MA और 1976 में खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी में विशेषज्ञता वाली SCD.

कैम्ब्रिज में उन्हें 1962 में स्मिथ पुरस्कार और 1967 में एडम्स पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे किंग्स कॉलेज (1963-1972) के फेलो और इंस्टीट्यूट ऑफ थियोरेटिकल एस्ट्रोनॉमी (1966-1972) के संस्थापक स्टाफ सदस्य के रूप में 1972 तक कैम्ब्रिज में रहे.

1966 में उन्होंने पीएचडी डिग्री प्राप्त गणितज्ञ मंगला राजवाड़े से विवाह किया. उनकी तीन बेटियां हैं. नार्लीकर 1972 में भारत लौटे और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में शामिल हो गए, जहां उन्होंने सैद्धांतिक खगोल भौतिकी समूह को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई.

1988 में उन्हें पुणे में इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) की स्थापना के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आमंत्रित किया गया था. 2003 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वे इसके संस्थापक निदेशक के रूप में कार्यरत रहे. सेवानिवृत्त होने के बाद, वे एमेरिटस प्रोफेसर के रूप में काम करते रहे.

लोकप्रिय विज्ञान संचारक थे नार्लीकर

1999 से 2003 तक उन्होंने ऊपरी वायुमंडल (41 किमी तक) से सूक्ष्मजीवों को इकट्ठा करने के लिए एक अंतरिक्ष अनुसंधान प्रयोग का नेतृत्व किया. जीवित कोशिकाओं और बैक्टीरिया की खोज ने सुझाव दिया कि पृथ्वी पर सूक्ष्मजीवों द्वारा लगातार बमबारी की जा सकती है, जो जीवन की संभावित अलौकिक उत्पत्ति का संकेत देती है.

नार्लीकर एक लोकप्रिय विज्ञान संचारक थे. उन्होंने अंग्रेजी, मराठी और हिंदी में किताबें, लेख लिखे और रेडियो और टीवी के लिए कार्यक्रम बनाए. 1996 में यूनेस्को ने उन्हें विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए कलिंग पुरस्कार से सम्मानित किया.

26 साल की उम्र में पद्म भूषण 

1965 में 26 वर्ष की आयु में उन्हें भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. बाद में 2004 में उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. वह भारत की तीनों राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों, लंदन की रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी और थर्ड वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज के फेलो थे.

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