शांति एक्ट कैसे पूरी तरह बदल देगा भारत के न्यूक्लियर पावर गेम? खुला अरबों डॉलर का रास्ता
शांति एक्ट के जरिए भारत ने परमाणु ऊर्जा कानून में ऐतिहासिक बदलाव करते हुए निजी कंपनियों को न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने और चलाने की अनुमति दे दी है. इस कानून ने सप्लायर लायबिलिटी हटाकर जोखिम को सीमित किया, जिससे न्यूक्लियर सेक्टर में निवेश और बीमा का रास्ता साफ हुआ है. विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम भारत को स्वच्छ और स्थिर ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा मोड़ है.
Shanti Act India nuclear energy law: भारतीय संसद द्वारा सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) एक्ट को पारित किया जाना भारत की सिविल न्यूक्लियर नीति में एक ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ माना जा रहा है.
यह कानून न केवल पुराने ढांचे को बदलता है, बल्कि भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को पहली बार वास्तव में निजी निवेश के लिए खोल देता है. अब निजी कंपनियां कानूनी रूप से न्यूक्लियर पावर प्लांट का निर्माण, स्वामित्व, संचालन और जरूरत पड़ने पर उन्हें बंद (डीकमीशन) भी कर सकेंगी.
क्यों जरूरी था शांति एक्ट?
दरअसल, पिछले एक दशक से भारत में परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं बन पा रही थीं. इसकी सबसे बड़ी वजह थी न्यूक्लियर दुर्घटना से जुड़ी जिम्मेदारी (लायबिलिटी) का अस्पष्ट और जोखिम भरा ढांचा. परमाणु ऊर्जा का जोखिम आम उद्योगों जैसा नहीं होता.
यहां खतरा रोजमर्रा के ऑपरेशन से नहीं, बल्कि बहुत दुर्लभ लेकिन बेहद विनाशकारी दुर्घटनाओं से जुड़ा होता है. ऐसे जोखिम को न तो सामान्य बीमा कंपनियां आसानी से कवर कर पाती हैं और न ही बैंक इसे सही तरीके से आंक पाते हैं. नतीजा यह हुआ कि निजी पूंजी और विदेशी कंपनियां भारत के न्यूक्लियर सेक्टर से दूरी बनाए रहीं.
2010 का कानून और उसकी सबसे बड़ी खामी
2010 में लाया गया सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट (CLNDA) देखने में तो अंतरराष्ट्रीय मानकों जैसा था, लेकिन इसके एक प्रावधान ने पूरे सिस्टम को बिगाड़ दिया. इस कानून की धारा 17(b) के तहत न्यूक्लियर उपकरण सप्लायरों पर भी दुर्घटना की स्थिति में कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला रखा गया. इसका मतलब यह हुआ कि सप्लायर पर अनिश्चित और असीमित जोखिम लटकता रहा.
यही वजह थी कि विदेशी न्यूक्लियर कंपनियां भारत से बाहर रहीं, घरेलू सप्लायर भी हिचकिचाए और बीमा कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए. बैंक भी बिना सरकारी गारंटी के फंडिंग को तैयार नहीं थे.
शांति एक्ट ने क्या बदला
शांति एक्ट ने इस पूरी व्यवस्था को जड़ से बदल दिया है. इस नए कानून के तहत 1962 का एटॉमिक एनर्जी एक्ट और 2010 का CLNDA दोनों को खत्म कर दिया गया है. सबसे अहम बदलाव यह है कि सप्लायर पर वैधानिक जिम्मेदारी पूरी तरह हटा दी गई है. अब दुर्घटना की स्थिति में कानूनी जिम्मेदारी केवल ऑपरेटर यानी प्लांट चलाने वाली कंपनी की होगी.
सप्लायर की जिम्मेदारी अब कानून से नहीं, बल्कि निजी कॉन्ट्रैक्ट के जरिए तय होगी. विशेषज्ञों के मुताबिक यही फर्क बाजार के लिए सबसे अहम है, क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट के जरिए जोखिम को मापा और कीमत में जोड़ा जा सकता है, जबकि खुली कानूनी जिम्मेदारी को नहीं.
अंतरराष्ट्रीय मानकों से तालमेल
शांति एक्ट के जरिए भारत ने खुद को विएना कन्वेंशन और कन्वेंशन ऑन सप्लीमेंट्री कंपेंसेशन (CSC) जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुरूप कर लिया है, जिनका वह पहले से हिस्सा है.
इस कानून में ऑपरेटर की अधिकतम जिम्मेदारी 300 मिलियन SDR (स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स) तय की गई है. यह सीमा कोई मनमानी राहत नहीं, बल्कि बीमा बाजार की क्षमता को ध्यान में रखकर तय की गई है, ताकि बीमा उपलब्ध रह सके और निवेशक डरें नहीं.
न्यूक्लियर लायबिलिटी फंड का प्रावधान
शांति एक्ट सिर्फ जिम्मेदारी सीमित करने तक नहीं रुकता. इसमें न्यूक्लियर लायबिलिटी फंड बनाने का भी प्रावधान है, जो बड़े हादसे की स्थिति में ऑपरेटर की सीमा से आगे जाकर मुआवजा देने में मदद करेगा. यह मॉडल अमेरिका के प्राइस–एंडरसन एक्ट जैसा है, जहां इंडस्ट्री पूल और सरकार मिलकर बड़े जोखिम को संभालती हैं.
सरल शब्दों में कहें तो अब परमाणु दुर्घटना का बेहद बड़ा खतरा अकेले किसी कंपनी पर नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से संभाला जाएगा.
निवेश और बिजली सेक्टर पर असर
इस बदलाव का सीधा असर न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स की लागत पर पड़ेगा. अब तक कानूनी अनिश्चितता के कारण इन परियोजनाओं की फंडिंग बहुत महंगी हो जाती थी. शांति एक्ट के बाद बीमा सस्ता होगा, कर्ज आसान मिलेगा और न्यूक्लियर पावर को एक बैंक योग्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट माना जाएगा.
खासतौर पर स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) के लिए यह कानून बेहद अहम है, क्योंकि उनका बिजनेस मॉडल बड़े पैमाने पर एक जैसे रिएक्टर लगाने पर टिका है.
आलोचना और सरकार का तर्क
कुछ आलोचकों का कहना है कि यह कानून निजी मुनाफे को बढ़ावा देता है और नुकसान जनता पर डालता है. लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि रोजमर्रा की सुरक्षा, संचालन और नियमों की जिम्मेदारी पूरी तरह निजी ऑपरेटर पर ही रहेगी. सरकार सिर्फ उस बेहद दुर्लभ, विनाशकारी जोखिम को संभालेगी जिसे कोई भी निजी कंपनी अकेले नहीं उठा सकती.
भारत की ऊर्जा रणनीति में नई दिशा
शांति एक्ट यह भी साफ करता है कि परमाणु ऊर्जा का निजीकरण रणनीतिक क्षेत्रों तक नहीं जाएगा. यूरेनियम संवर्धन, खर्च हुए ईंधन का प्रबंधन और भारी पानी का उत्पादन अब भी सरकार के नियंत्रण में रहेगा.
भारत की यह नीति नवीकरणीय ऊर्जा के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी पूरक है. बढ़ती बिजली मांग, एआई और इंडस्ट्री के विस्तार के दौर में स्थिर और स्वच्छ बेसलोड बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा को जरूरी माना जा रहा है.
कुल मिलाकर, शांति एक्ट ने वह अधूरा काम पूरा किया है जो 2010 में छूट गया था। अब भारत में परमाणु ऊर्जा केवल एक रणनीतिक सपना नहीं, बल्कि निवेश योग्य और व्यावहारिक सेक्टर बन चुकी है. आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इसे कितनी पारदर्शिता और मजबूती से लागू करती है.










