बिना इंजन, बिना कील… कैसे बनाया गया INSV Kaundinya? गुजरात से ओमान तक हवा के भरोसे चलेगा भारत का अनोखा जहाज
भारतीय नौसेना का अनोखा जहाज INSV कौंडिन्य बिना इंजन और बिना लोहे की कीलों के गुजरात से ओमान के लिए रवाना हो रहा है. यह जहाज 1500 साल पुरानी भारतीय समुद्री तकनीक से तैयार किया गया है, जिसे हवा और पालों के सहारे चलाया जाएगा. इस यात्रा के जरिए भारत अपनी प्राचीन समुद्री विरासत और विश्व गुरु बनने की ऐतिहासिक भूमिका को फिर से दुनिया के सामने पेश कर रहा है.
INSV Kaundinya: भारत एक बार फिर अपने गौरवशाली समुद्री इतिहास को दुनिया के सामने जीवित करने जा रहा है. भारतीय नौसेना का विशेष जहाज INSV कौंडिन्य सोमवार को गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट के लिए रवाना होगा. यह कोई आम समुद्री यात्रा नहीं है, बल्कि भारत की 1500 साल पुरानी समुद्री परंपराओं और जहाज निर्माण तकनीक की वास्तविक परीक्षा है.
इस ऐतिहासिक यात्रा की सबसे खास बात यह है कि INSV कौंडिन्य में न इंजन है, न धातु की कीलें और न ही कोई आधुनिक प्रोपल्शन सिस्टम. यह जहाज पूरी तरह हवा, पाल और प्राचीन भारतीय जहाज निर्माण तकनीक के सहारे समुद्र में आगे बढ़ेगा.
Wonderful to see that INSV Kaundinya is embarking on her maiden voyage from Porbandar to Muscat, Oman. Built using the ancient Indian stitched-ship technique, this ship highlights India's rich maritime traditions. I congratulate the designers, artisans, shipbuilders and the… pic.twitter.com/bVfOF4WCVm
क्या है INSV कौंडिन्य?
आधुनिक नहीं, प्राचीन ज्ञान का चलता-फिरता उदाहरण
INSV कौंडिन्य एक स्टिच्ड सेल शिप (Stitched Sail Ship) है, जिसे भारत में 5वीं सदी ईस्वी के आसपास इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों से तैयार किया गया है. इसका डिज़ाइन मुख्य रूप से अजंता की गुफाओं में बने चित्रों, प्राचीन भारतीय ग्रंथों और विदेशी यात्रियों के विवरणों पर आधारित है.
यह जहाज भारतीय नौसेना का हिस्सा जरूर है, लेकिन यह युद्धपोत नहीं है. इसका उद्देश्य भारत की प्राचीन समुद्री क्षमता, तकनीकी समझ और वैश्विक संपर्कों को दोबारा जीवंत करना है.
'स्टिच्ड शिप' क्यों कहलाता है यह जहाज?
INSV कौंडिन्य को 'स्टिच्ड शिप' कहा जाता है क्योंकि इसके लकड़ी के तख्तों को लोहे की कीलों से नहीं, बल्कि नारियल के रेशे से बनी कोयर रस्सियों से सिला गया है.
जहाज के ढांचे को समुद्री पानी से सुरक्षित रखने के लिए प्राकृतिक रेज़िन, कपास और तेलों का इस्तेमाल किया गया है. यही तकनीक सदियों पहले भारतीय नाविकों और व्यापारियों द्वारा अपनाई जाती थी.
कैसे बनाया गया INSV Kaundinya?
धातु से पूरी तरह दूर, लचीलापन इसकी ताकत
INSV कौंडिन्य की लंबाई करीब 19.6 मीटर, चौड़ाई 6.5 मीटर और ड्राफ्ट लगभग 3.33 मीटर है. इस जहाज पर करीब 15 नौसैनिकों का दल सवार रहेगा और यह पूरी तरह पालों से संचालित होगा.
इस जहाज का निर्माण 'टंकई विधि' (Tankai Method) से किया गया है. यह एक पारंपरिक भारतीय तकनीक है जिसमें पहले जहाज का बाहरी ढांचा सिलकर तैयार किया जाता है और उसके बाद अंदर की रिब्स लगाई जाती हैं.
इससे जहाज में लचीलापन आता है, जिससे यह ऊंची समुद्री लहरों का दबाव सह पाता है और टूटने की बजाय झुककर खुद को सुरक्षित रखता है.
निर्माण में इस्तेमाल सामग्री:
- लकड़ी के तख्ते
- नारियल रेशे से बनी कोयर रस्सी
- प्राकृतिक रेज़िन और तेल (वॉटरप्रूफिंग के लिए)
किसने बनाया यह अनोखा जहाज?
INSV कौंडिन्य परियोजना की शुरुआत जुलाई 2023 में हुई थी. यह परियोजना संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होडी इनोवेशंस के संयुक्त प्रयास से शुरू की गई, जिसे वित्तीय सहायता संस्कृति मंत्रालय ने दी.
केरल के पारंपरिक जहाज कारीगरों की एक टीम ने इसे हाथों से सिला, जिसका नेतृत्व मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन ने किया.
चूंकि इस तरह के जहाजों के कोई लिखित ब्लूप्रिंट मौजूद नहीं थे, इसलिए भारतीय नौसेना ने ऐतिहासिक चित्रों और वैज्ञानिक परीक्षणों के जरिए डिज़ाइन को दोबारा तैयार किया.
सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए IIT मद्रास में हाइड्रोडायनामिक टेस्ट भी किए गए.
लॉन्च से लेकर नौसेना में शामिल होने तक का सफर
INSV कौंडिन्य को फरवरी 2025 में लॉन्च किया गया था। इसके बाद मई 2025 में कर्नाटक के कारवार में इसे औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना में शामिल किया गया.
जहाज पर बने प्रतीकों का मतलब इतिहास की गूंज
INSV कौंडिन्य पर कई ऐसे प्रतीक बनाए गए हैं जो भारत की प्राचीन समुद्री विरासत को दर्शाते हैं:
- गंडभेरुंड – कदंब वंश का दो सिर वाला गरुड़
- पालों पर सूर्य चिन्ह – ऊर्जा और दिशा का प्रतीक
- सिंह याली – जहाज के अग्रभाग पर बना पौराणिक सिंह
- हड़प्पा शैली का पत्थर का लंगर – सिंधु घाटी सभ्यता की याद
कौन थे कौंडिन्य? – भारत का पहला वैश्विक नाविक
इस जहाज का नाम कौंडिन्य पर रखा गया है, जो पहली सदी के भारतीय समुद्री यात्री थे. दक्षिण-पूर्व एशिया और चीनी अभिलेखों के अनुसार, कौंडिन्य ने समुद्र के रास्ते मेकॉन्ग डेल्टा की यात्रा की, वहां की रानी सोमा से विवाह किया और फुनान साम्राज्य की स्थापना में भूमिका निभाई.
आज का कंबोडिया उसी फुनान साम्राज्य का हिस्सा माना जाता है। माना जाता है कि ख्मेर और चाम वंश की जड़ें भी इसी संबंध से जुड़ी हैं.
हालांकि भारतीय ग्रंथों में उनका उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन वैश्विक इतिहास में कौंडिन्य को पहला नामित भारतीय समुद्री यात्री माना जाता है.
यह यात्रा क्यों है बेहद अहम?
भारत से ओमान और आगे दक्षिण-पूर्व एशिया तक का समुद्री मार्ग कभी मसालों, वस्त्रों और विचारों का प्रमुख व्यापारिक रास्ता हुआ करता था. इसी मार्ग से भारत ने पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया से सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बनाए.
INSV कौंडिन्य की यह यात्रा उन प्राचीन समुद्री हाइवे को दोबारा जीवंत करने की कोशिश है, जो यह साबित करती है कि भारत केवल भूमि पर ही नहीं, बल्कि समुद्रों पर भी सदियों से विश्व गुरु रहा है.










